Sunday, April 10, 2016

यहाँ खुद मिटकर खुद को पाना होता है...

ये दुनिया बड़ी अजीब है 
यहाँ खुद मिटकर खुद को पाना  होता है
लोगों की इस भीड़ में 
एक झूठा चेहरा दिखाना होता है 
खुद को गवां बैठे हैं हम 
कुछ कर दिखाने के चक्कर में 
हम तो बदलना नहीं चाहते थे 
हमें तो हालातों ने बदला है 
हम तो यह भी भूल चुके हैं... 
कि क्या बनने आये थे 
और क्या बन गए के रह गए हैं 
ज़िन्दगी की इस भागदौड़ में 
सही तो कहा है किसी ने 
कि यहाँ खुद मिटकर 
खुद को पाना  होता है !!!

Sunday, March 13, 2016

हमें इख्तलाह भी न हुई...

हमें इख्तलाह भी न हुई
तुम्हारी रुसवाई की
और तुम कुछ यूं ख़फ़ा हुए
कि ज़माने को भी भनक न लगी !!

Monday, November 23, 2015

गलतफहमियाँ गर होती ...

गलतफहमियाँ  गर होती
तो हम शिकायत न करते
तुमने बिना रूबरू हुए
फैसले खुद ही ले लिए !!

Saturday, November 21, 2015

ये वादियाँ हमें कितना कुछ सिखाती हैं ...




ये वादियाँ हमें कितना कुछ सिखाती हैं 
अन्जाने लोगों को अच्छा दोस्त बनाती हैं 
नहीं सोंचा था.…
एक डोर में बंध पाएंगे हम
दोस्ती का मीठा रिश्ता बनायेंगे हम
पर कितना आसान था ये
या ये कह लो …
इन वादियों ने हमें करीब ला दिया
पर कुछ भी हो
हमें अच्छे दोस्तों से मिला दिया!!

Sunday, November 15, 2015

तुम्हे वक़्त ही कहाँ मिला हमें समझने का...

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया 
बात निकली तो हर बात पे रोना आया 
सोंचती हूँ तो समझ नहीं आता 
कि तुम्हें किस बात पे गुस्सा आया 
ख़फ़ा  थे तो कह के  देखते 
शायद तुम्हारी नाराजगी की वज़ह 
हम समझ पाते!
मूक रहकर…
हम तुम्हे कैसे समझ पाते 
चलो छोड़ो जाने भी दो 
क्या सिकवा करें तुमसे 
हमारी शिकायत की वज़ह 
सही भी तो न  होगी 
तुम्हे वक़्त ही कहाँ मिला 
हमें समझने  का  !!



Monday, October 19, 2015

एक सपना बुना था...

बचपन में उड़ते परिंदे को देखकर
एक सपना बुना था मैंने
हाँ उड़ना चाहती थी
उस परिंदे की तरह
छूना चाहती थी नीले
आसमान को.…
और हौंसले की कमी भी न थी
पर शायद वक़्त ने
पर ही क़तर दिए !!!

Thursday, August 06, 2015

चले जा रहे हैं...

बस चले  जा रहे हैं
इस अन्जानी सी राह पे
न मंजिल का कुछ पता
न राहों से कोई वास्ता
बस अपनी ही धुन में
चले जा रहे हैं
हाँ तुम्हारे साथ का
भीना सा एक एहसास है
बस उस एहसास के साथ
एक भरोसे  की डोर
बाँधी है मैंने
अब डोर कितनी
मजबूत है
ये फैसला
वक्त का होगा !!!

Thursday, July 16, 2015

साज़िशें वक़्त की

कैसी हैं ये साज़िशें वक़्त की
जहाँ हर वक़्त तुम याद आते हो
बचपन की वो बातें
आँख बंद करते ही
याद दिलाते हो
फिर से जीना चाहती हूँ
वो लम्हे…
वो बेफिक्री की ज़िन्दगी
जहाँ तुम थे मेरा
हाँथ थामे
जहाँ  ख़ुशी और गम का
बँटवारा भी न था
या ये कह लो तुम्हारे साये में
हमें  इनका फरक भी पता न था
लौट जाना चाहती हूँ
उस बचपन में जहाँ तुम थे
न कि तुम्हारी यादें !!!





Monday, June 15, 2015

ये बारिश और तरशती आँखे...

अजीब सी कसक है इन आँखों में
एक सूनापन या
किसी के आने का इन्तज़ार
एक गुजरा लम्हा या
एक नए सपने की आस
तुम्हारी आहट तो सुनाई देती है
पर तुम दिखाई नहीं देते
उफ़ ये डरी  सी सहमी सी आँखे
कुछ  तो कहना चाहती हैं
बारिश की हर गिरती बूँद के साथ
तुम्हारी राह तकना चाहती हैं
कभी तो कुछ तो बोलोगे
कुछ तो कहोगे
इस आस में बेपनाह
तुम्हारी राह तकना
चाहती हैं !!!

Saturday, June 06, 2015

वक़्त मिला तो सोंचा...

आज कुछ वक़्त मिला तो सोंचा 
ज़िन्दगी के कुछ पन्ने पलट के देख लूँ 
सुना था लोगों को कहते हुए 
कि ज़िन्दगी इतनी आसाँ नहीं होती 
शायद ये बात अब समझ में आई 
हालाँकि  सुनने और समझने में 
फरक बहुत है 
तभी तो शायद इतना वक़्त लग गया 
इस फरक को समझने में 
हाँ कदम थोड़े डगमगाए जरूर थे 
लेकिन हौंसले की कमी  न थी !!!