Wednesday, June 01, 2016

डरती हूँ ...

सीप में  मोतियों की तरह
सजाया है तुझे इस दिल में
डरती हूँ  कि  कहीं
तुझे कोई चुरा न ले !!! 

Monday, May 16, 2016

नाज़ुक रिश्ते...

वक़्त रहते ही रिश्तों को संभाल लेना चाहिए 
क्योंकि इनकी उलझन भी बड़ी अजीब होती है 
जरा सी चूक होते ही 
अक्सर टूट जातें हैं !!


Tuesday, May 03, 2016

कल की सोंच में...

जब तुमसे कुछ कहने के लिए 
तुम्हारे पास आना चाहा 
तुम्हारे पास वक़्त ही न था .. 
जब तुम्हारी पनाहों में आकर 
कुछ वक़्त गुजारना चाहा 
तुम्हारे पास वक़्त ही न था .. 
हम वक़्त के ऐसे मोहताज़ क्या हुए 
कि  अब वक़्त आया तो 
न कुछ कहने को है 
न ही कुछ सुनने को !!!

Sunday, April 10, 2016

यहाँ खुद मिटकर खुद को पाना होता है...

ये दुनिया बड़ी अजीब है 
यहाँ खुद मिटकर खुद को पाना  होता है
लोगों की इस भीड़ में 
एक झूठा चेहरा दिखाना होता है 
खुद को गवां बैठे हैं हम 
कुछ कर दिखाने के चक्कर में 
हम तो बदलना नहीं चाहते थे 
हमें तो हालातों ने बदला है 
हम तो यह भी भूल चुके हैं... 
कि क्या बनने आये थे 
और क्या बन गए के रह गए हैं 
ज़िन्दगी की इस भागदौड़ में 
सही तो कहा है किसी ने 
कि यहाँ खुद मिटकर 
खुद को पाना  होता है !!!

Sunday, March 13, 2016

हमें इख्तलाह भी न हुई...

हमें इख्तलाह भी न हुई
तुम्हारी रुसवाई की
और तुम कुछ यूं ख़फ़ा हुए
कि ज़माने को भी भनक न लगी !!

Monday, November 23, 2015

गलतफहमियाँ गर होती ...

गलतफहमियाँ  गर होती
तो हम शिकायत न करते
तुमने बिना रूबरू हुए
फैसले खुद ही ले लिए !!

Saturday, November 21, 2015

ये वादियाँ हमें कितना कुछ सिखाती हैं ...




ये वादियाँ हमें कितना कुछ सिखाती हैं 
अन्जाने लोगों को अच्छा दोस्त बनाती हैं 
नहीं सोंचा था.…
एक डोर में बंध पाएंगे हम
दोस्ती का मीठा रिश्ता बनायेंगे हम
पर कितना आसान था ये
या ये कह लो …
इन वादियों ने हमें करीब ला दिया
पर कुछ भी हो
हमें अच्छे दोस्तों से मिला दिया!!

Sunday, November 15, 2015

तुम्हे वक़्त ही कहाँ मिला हमें समझने का...

कभी खुद पे कभी हालात पे रोना आया 
बात निकली तो हर बात पे रोना आया 
सोंचती हूँ तो समझ नहीं आता 
कि तुम्हें किस बात पे गुस्सा आया 
ख़फ़ा  थे तो कह के  देखते 
शायद तुम्हारी नाराजगी की वज़ह 
हम समझ पाते!
मूक रहकर…
हम तुम्हे कैसे समझ पाते 
चलो छोड़ो जाने भी दो 
क्या सिकवा करें तुमसे 
हमारी शिकायत की वज़ह 
सही भी तो न  होगी 
तुम्हे वक़्त ही कहाँ मिला 
हमें समझने  का  !!



Monday, October 19, 2015

एक सपना बुना था...

बचपन में उड़ते परिंदे को देखकर
एक सपना बुना था मैंने
हाँ उड़ना चाहती थी
उस परिंदे की तरह
छूना चाहती थी नीले
आसमान को.…
और हौंसले की कमी भी न थी
पर शायद वक़्त ने
पर ही क़तर दिए !!!

Thursday, August 06, 2015

चले जा रहे हैं...

बस चले  जा रहे हैं
इस अन्जानी सी राह पे
न मंजिल का कुछ पता
न राहों से कोई वास्ता
बस अपनी ही धुन में
चले जा रहे हैं
हाँ तुम्हारे साथ का
भीना सा एक एहसास है
बस उस एहसास के साथ
एक भरोसे  की डोर
बाँधी है मैंने
अब डोर कितनी
मजबूत है
ये फैसला
वक्त का होगा !!!