Passionate about poetry, nature and human psychology. A wanderer, firm believer of creativity, the best quality a person can acquire in his lifetime. This is the blog of Pratibha Verma.
Sunday, August 17, 2014
Thursday, August 14, 2014
कैसा है आज़ादी का रंग ...
आजादी का रंग
कैसा है
किसी को पता है
तीन रंग में
रंगा तिरंगा
अशोक चक्र के साथ
हाँ बचपन से
यही तो
देखा है
पर सोंच के तो देखो
कि आज़ादी का
रंग कैसा है
कोई रंग आया
समझ में
चेहरे पर ख़ुशी के साथ
शायद नहीं
हमें नहीं पता
कैसा रंग है आजादी का
क्या हम सच में
आज़ाद हुए है
या अब भी गुलाम हैं
सोंच के देखो
शायद कोई
जवाब मिल जाए।।
Sunday, August 10, 2014
प्यार के दो धागे...
माना कि है
ये त्योहार कुछ
रश्मों का
पर प्यार बहुत
है उन अनमोल
पलों का
हाँ याद हैं
वो सभी पल
वो बचपन की बातें
वो हमारा
लड़ना झगड़ना
और वो सरारतें
ये प्यार के दो धागे
कैसे जोड़ते हैं
एक रिश्ते को
बड़ी ही सहजता
के साथ
संजोया है इस रिश्ते को!!
ये त्योहार कुछ
रश्मों का
पर प्यार बहुत
है उन अनमोल
पलों का
हाँ याद हैं
वो सभी पल
वो बचपन की बातें
वो हमारा
लड़ना झगड़ना
और वो सरारतें
ये प्यार के दो धागे
कैसे जोड़ते हैं
एक रिश्ते को
बड़ी ही सहजता
के साथ
संजोया है इस रिश्ते को!!
Wednesday, August 06, 2014
Sunday, August 03, 2014
तेरी मेरी कहानी ...
तू ही बता कहाँ से शुरू करूँ
बचपन की वो खट्टी मीठी बातें
या हमारी बड़ी बड़ी सरारतें
वो हमारा झगड़ना
छोटी छोटी बातों पे तेरा मुझसे
रूठना,मनाना, शिकायतें
फिर मुहँ फुला के ये कहना
जाओ मुझे तुमसे
बात नहीं करनी
और थोड़ी देर बाद
दबी सी आवाज़ मे ये कहना
ओये प्रतिभा मैं अभी भी
नाराज़ हूँ, और ऐसे नहीं मनाने वाली
पूरी पूरी रात मेरे साथ जगना
मुझे नींद न आने पे
माँ की तरह सुलाना
मेरी हर बात को सुनना
मेरे परेशाँ हो जाने पर
तेरा भी परेशाँ हो जाना
सब याद है मुझे
क्या मिशाल दूँ
अपनी दोस्ती की
तू कल भी मेरे लिए ख़ास थी
और आज भी है।।
Friday, August 01, 2014
फलक से शिकायत …
आज नींद को
फलक से
शिकायत क्यों है
इसमें फलक का
क्या कसूर,
खता तो इस
दिल की है
जो तुम्हारी
याद में सो न सका!!!
फलक से
शिकायत क्यों है
इसमें फलक का
क्या कसूर,
खता तो इस
दिल की है
जो तुम्हारी
याद में सो न सका!!!
Wednesday, July 30, 2014
वो कच्ची पक्की सी यादें ...
याद हैं मुझे तुम्हारे साथ
बिताये हर पल
जिनमें तुम थे
और हमारा छोटा
सा परिवार
हँसता खेलता
एक प्यारा सा
संसार
वो बचपन की यादें
वो मेरी सरारतें
तुमको दुखी करके
मेरा वो खुश हो जाना
फिर प्यार से तुम्हारे
पास आके तुम्हारे
गले से लग जाना
मुझे माफ़ करके
तुम्हारा वो खुश हो जाना
वो कच्ची पक्की सी यादें
क्यों कर रही हैं
परेशाँ मुझे
आखिर आज क्यों
तुम इतना याद आ
रहे हो
बचपन की हर याद को
मेरे सामने ला रहे हो
रोने का मन तो बहुत है
पर मुझे रोना नहीं है
हाँ मुझे पता है
मैं कमजोर हो रही हूँ
पर क्या करूँ मैं भी
तो आखिर एक इंसान हूँ। ।
बिताये हर पल
जिनमें तुम थे
और हमारा छोटा
सा परिवार
हँसता खेलता
एक प्यारा सा
संसार
वो बचपन की यादें
वो मेरी सरारतें
तुमको दुखी करके
मेरा वो खुश हो जाना
फिर प्यार से तुम्हारे
पास आके तुम्हारे
गले से लग जाना
मुझे माफ़ करके
तुम्हारा वो खुश हो जाना
वो कच्ची पक्की सी यादें
क्यों कर रही हैं
परेशाँ मुझे
आखिर आज क्यों
तुम इतना याद आ
रहे हो
बचपन की हर याद को
मेरे सामने ला रहे हो
रोने का मन तो बहुत है
पर मुझे रोना नहीं है
हाँ मुझे पता है
मैं कमजोर हो रही हूँ
पर क्या करूँ मैं भी
तो आखिर एक इंसान हूँ। ।
Tuesday, July 29, 2014
हाँ ये मैं ही हूँ…
हाँ ये मैं ही हूँ
जो कल थी लाचार सी...
तुम्हारे सामने
हर बात से डरती
हर बात से घबराती।
कुछ होता तो
तुम्हारे साये में आके
चुपके से छुप जाती ।
बिना किसी
बात के
यूँ ही डर जाती ...
पर आज मैं
बदल गई हूँ
हाँ मैं बदल गई हूँ ।
न है कुछ खोने का डर मुझे
न है कुछ पाने की चाहत
अब मुझमें ।
तुम न सही तो
तुमसा भी नहीं चाहिए
क्योंकि होगा वो भी...
एक इन्सान
शायद तुम्हारे जैसा
जो कल थी लाचार सी...
तुम्हारे सामने
हर बात से डरती
हर बात से घबराती।
कुछ होता तो
तुम्हारे साये में आके
चुपके से छुप जाती ।
बिना किसी
बात के
यूँ ही डर जाती ...
पर आज मैं
बदल गई हूँ
हाँ मैं बदल गई हूँ ।
न है कुछ खोने का डर मुझे
न है कुछ पाने की चाहत
अब मुझमें ।
तुम न सही तो
तुमसा भी नहीं चाहिए
क्योंकि होगा वो भी...
एक इन्सान
शायद तुम्हारे जैसा
या तुमसे अच्छा।।
Saturday, July 26, 2014
एक नया सफर…
हाँ पता है
तुम बढ़ा रही हो
एक नया कदम
एक नई ज़िन्दगी के लिए
खुश हूँ मैं तुम्हारे लिए
बहुत खुश
बस बचाना चाहती हूँ
तुम्हे दुनिया की नज़र से
और हमेंशा
खुश देखना चाहती हूँ
तुमको
जहाँ हो तुम्हारी एक
प्यारी सी दुनिया
एक प्यारा सा संसार
प्यारी सी ज़मीं
एक प्यारा सा आसमान
बस तुम खुश रहो
सलामत रहो सदा
यही दुआ है रब से।।
Wednesday, July 23, 2014
उफ़ ये रात …
उफ़ ये रात
काली सी डरावनी सी...
रोज़ आ जाती है
कुछ नए सपने लिए
कुछ पुराने दर्द लिए।
अपने अंदर
कुछ सिसकियाँ
और कुछ लम्हे छुपाये।
क्यों आती है
ये रात
उन लम्हों के साथ।
मुझे कुरेदती है
कुछ नए सपने
भी दिखाती है।
डर लगता है
इन रातों में...
तुम्हारा ही साया
दिखता है
इन अंधेरों में।
डरती हूँ आँख बन्द करने से
कि कहीं फिर एक सपना
टूटने को सवँर न जाए।।
काली सी डरावनी सी...
रोज़ आ जाती है
कुछ नए सपने लिए
कुछ पुराने दर्द लिए।
अपने अंदर
कुछ सिसकियाँ
और कुछ लम्हे छुपाये।
क्यों आती है
ये रात
उन लम्हों के साथ।
मुझे कुरेदती है
कुछ नए सपने
भी दिखाती है।
डर लगता है
इन रातों में...
तुम्हारा ही साया
दिखता है
इन अंधेरों में।
डरती हूँ आँख बन्द करने से
कि कहीं फिर एक सपना
टूटने को सवँर न जाए।।
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