कच्ची उम्र के वो सपने
कितने सुहाने लगते थे
पेड़ की टहनियों के
झूले झूलना
उँगलियों से
रेत के घर बनाना
वो घर का आँगन
सुबह सूरज की
वो पहली किरण
कितने सुहाने पल थे वो
बीत गया वो बचपन
वो अल्ल्हड़पन
वो बातों के बताशे
वो बिना बात के मुहं
फुला के बैठ जाना
वो चौमासे के पानी में
कागज की नाव चलाना
वो भीग भाग कर
गली में छुप जाना
वो साँझ वो सवेरा
वो बचपन सुनहरा
बीत गया सब
बस रह गई हैं
वो मीठी सी यादें
जो जाने अनजाने
चेहरे पे एक
मुस्कान बिखेरती हैं !!!