Thursday, March 12, 2015

वो सुहाने पल...




कच्ची उम्र के वो सपने
कितने सुहाने लगते थे
पेड़ की टहनियों के
झूले झूलना
उँगलियों से
रेत के घर बनाना
वो घर का आँगन
सुबह सूरज की
वो पहली किरण
कितने सुहाने पल थे वो
बीत गया वो बचपन
वो अल्ल्हड़पन
वो बातों के बताशे
वो बिना बात के मुहं
फुला के बैठ जाना
वो चौमासे के पानी में
कागज की नाव चलाना
वो भीग भाग कर
गली में छुप जाना
वो साँझ वो सवेरा
वो बचपन सुनहरा
बीत गया सब
बस रह गई हैं
वो मीठी सी यादें
जो जाने अनजाने
चेहरे पे एक
मुस्कान बिखेरती हैं !!! 

10 comments:

  1. Time never wait for any one , it walks on.

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (13-03-2015) को "नीड़ का निर्माण फिर-फिर..." (चर्चा अंक - 1916) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. इस कच्ची उम्र के सपने बुढापे तक भी नही जाते ...
    भावभीनी रचना ...

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  4. मनभावन यादों की बहुत सुंदर तसवीर खींची है आपने बधाई स्वीकार करें ...सादर

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  5. यादों का खूबसूरत सफ़र पसंद आया।

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  6. प्रतिभा जी बहुत सुन्दर और जीवंत बाल चित्रण
    भ्रमर ५

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  7. क्या बात है आपने पूरे बचपन के कुछ बिन्दुओं को ऐसे समेटा कि एक सांस में पढता चला गया ...........बहुत अच्छी रचना!

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  8. बहुत सुन्दर

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