Thursday, August 28, 2014

समझना चाहती हूँ तुमको...

तुम्हारी मासूम सी 
सूरत देखकर
कुछ ख्याल आते हैं 
मन में,
शायद कोई दर्द छुपा है
इस दिल में,
या हज़ारों राज़ दबे हैं
इन पलकों में,
तुम्हारी खामोश आँखे
कुछ कहती हैं मुझसे
शायद कुछ कहना 
चाहती हैं
शायद पलकों में 
छुपे राज
बताना चाहती हैं
या तुम्हारे दिल के दर्द
बाँटना चाहती हैं
तुम मुँह से 
कुछ नहीं कहते 
तुम्हारी ख़ामोशी 
कुछ तो बोलती है 
समझना चाहती हूँ 
इस ख़ामोशी को
या ये कह लो समझना 
चाहती हूँ तुमको!!


10 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (29.08.2014) को "सामाजिक परिवर्तन" (चर्चा अंक-1720)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  2. सुन्दर और भाप्रणव प्रस्तुति।

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  3. मौन को समझना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...

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  4. wah ! bhavpurn prastuti

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  5. गणेश चतुर्थी की शुभकामनाएं ! बहुत अच्छी प्रस्तुति !!

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  6. बहुत मुश्किल होता है यह काम. हाँ चेहरे से कुछ संकेत तो पढ़े जाते हैं.

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  7. Mann ke hare har hai....Mann ke jeet hai...very nice lines....

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  8. gurukulvani12:54 PM

    bahut sunder bhav

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