Thursday, September 18, 2014

फ़ासले दरमियाँ हमारे...

न जाने कहाँ से आ गए
दरमियाँ हमारे फ़ासले।

न दिल की सुनी तुमने कभी
न जुबाँ से कहा हमने कभी।

बस अपने अहम की आग
में जलते रहे तुम ।

न हमने कभी कोशिश की
बुझाने की ।

अब फासले इस कदर
बढ़ चुके  हैं दरमियाँ हमारे ।

सोंचती हूँ क्यों  न
हम अपनी राह ही बदल लें।।

10 comments:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (19.09.2014) को "अपना -पराया" (चर्चा अंक-1741)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

    ReplyDelete
  2. रुआंस भरी पंक्तियाँ
    एक दुसरे पर विश्वास दिखाना होता है ....राह बदल लेने से मुश्किलें आसां न होगी.


    पासबां-ए-जिन्दगी: हिन्दी

    ReplyDelete
  3. एहसास को बहुत खूबसूरती से चित्रित किया है

    ReplyDelete
  4. सुंदर अभिव्यक्ति! आदरणिया प्रतिभा जी!
    धरती की गोद

    ReplyDelete
  5. वाह ! बहुत खूब ! बहुत सुन्दर !

    ReplyDelete
  6. बहुत ही बढ़िया


    सादर

    ReplyDelete
  7. ”अहम’ एक दो-धारी तलवार है--कभी हमें बचाती भी है तो कभी-कभी हमें घायल भी करती है.

    ReplyDelete
  8. सुन्दर प्रस्तुति...........दीवाली की हार्दिक शुभकामनायें! मेरी नयी रचना के लिए मेरे ब्लॉग "http://prabhatshare.blogspot.in/2014/10/blog-post_22.html" पर सादर आमंत्रित है!

    ReplyDelete
  9. ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति… दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएँ...

    ReplyDelete