Wednesday, July 23, 2014

उफ़ ये रात …

उफ़ ये रात
काली सी डरावनी सी...

रोज़ आ जाती है
कुछ नए सपने लिए
कुछ पुराने दर्द लिए।

अपने अंदर
कुछ सिसकियाँ
और कुछ लम्हे छुपाये।

क्यों आती है
ये रात
उन लम्हों के साथ।

मुझे कुरेदती है
कुछ नए सपने
भी दिखाती है।

डर लगता है
इन रातों में...

तुम्हारा ही साया
दिखता  है
इन अंधेरों में।

डरती हूँ आँख बन्द  करने से
कि कहीं फिर एक सपना
टूटने को सवँर न जाए।।     

13 comments:

  1. सुंदर अभिव्यक्ति ।

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (25.07.2014) को "भाई-भाई का भाईचारा " (चर्चा अंक-1685)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

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  3. बहुत खूब प्रतिभा जी


    सादर

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  4. क्यों आती है
    ये रात
    उन लम्हों के साथ।
    मुझे कुरेदती है
    कुछ नए सपने
    भी दिखाती है।
    ....सपने जीना सीखा कर एक नयी राह दिखा देती है
    ...बहुत बढ़िया

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  5. सपने सच हो जायें आपके।
    सुन्दर रचना।

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  6. खुबसूरत अभिवयक्ति.....

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  7. वाह, कहीं एक सपना टूटने को संवर न जाए।

    शिशकियां को सिसकियाँ कर लेंगी तो रचना और सुंदर लगेगी।

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  8. सुन्दर प्रस्तुति

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