Monday, August 19, 2013

ओ धुंधलाती हुई शाम…

ओ धुंधलाती हुई शाम
जहाँ था तुम्हारा इंतज़ार
और तुम्हारी यादें

आसपास थी हलचल
लेकिन मेरे अन्दर
कहीं था सन्नाटा

एक सूनापन
जो खुद ही से कुछ
कह रहा था

शायद तुम्हारी याद में
बेपनाह मुझको
झिझोड़  रहा था

कह रहा था तुम
न आओगे लौट कर
वापस

ये कहकर ओ
मेरे सपने को
तोड़ रहा था

लड़ रही थी इन सबसे
सँजो  कर रखना चाहती थी
इस सपने को

जिसमें तुम हो
और तुम्हारी यादें
देखतें हैं कौन जीतता है !!!


16 comments:

  1. बहुत ही सुंदर और सार्थक प्रस्तुती, आभार।

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  2. बहुत ही सुंदर और सार्थक प्रस्तुती, आभार।

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  3. नमस्कार आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (20 -08-2013) के चर्चा मंच -1343 पर लिंक की गई है कृपया पधारें. सूचनार्थ

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  4. जिसमें तुम हो
    और तुम्हारी यादें
    देखतें हैं कौन जीतता है !!!

    यादों में ही रहता है व्यक्ति का अक्स ,

    उसकी यादें और बातें मुलाकातें -

    और वो बोलते बतियाते रास्ते -

    जिसने कभी बा वास्ता थे वह दोनों।

    सुन्दर रचना है।

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  5. सपने टूट भी जाएं तो यादें नहीं जाती ...
    प्यार एहसास भरी रचना ...

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  6. बहुत ही भावपूर्ण ओर सुन्दर रचना, रक्षा बंधन की बधाई ओर शुभकामनायें .

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  7. बहुत सुंदर एवँ मोहक रचना ! रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनायें !

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  8. Bahut khub... Kya likha hai...

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  9. बहुत अच्छी रचना ।

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  10. बहुत सुंदर रचना...

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  11. इंतज़ार और आस के पल और फल दोनों ही मीठे होतें हैं क्योंकि मन मोदक हैं दोनों।

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  12. बहुत सुंदर !
    :)
    सुना था सपने
    संजोये जाते हैं
    पहली भार सुना
    सपने लडे़ भी जाते है
    किसी की हार
    होती है और
    कोई जीत जाते हैं !

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  13. बहुत सुन्दर रचना .
    http://yunhiikabhi.blogspot.com

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