Friday, September 23, 2016

माना कि ज़िन्दगी आसाँ...

माना कि ज़िन्दगी आसाँ  नहीं होती,
जब जीने की कोई वजह नहीं होती!
अधूरे लम्हों की अधूरी कहानी सी लगती है,
अपनी ही दास्ताँ बेगानी सी लगती है !
माफ़ कर सको तो कर देना उस शक्स को,
वरना ज़िन्दगी हमारी नहीं लगती है !!

4 comments:

  1. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल रविवार (25-09-2016) के चर्चा मंच "शिकारी और शिकार" (चर्चा अंक-2476) पर भी होगी!
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. बहुत खूब

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  3. बहुत बढ़िया

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