Thursday, July 14, 2016

क्यों खामोश हैं ये रातें ...


क्यों कुछ नहीं बोलती ये रातें 
क्यों नहीं करती हैं ये बातें 
शाम की सुहानी छांव के बाद 
माना हंसी हैं ये रातें 
चाँद की रौशनी में डूबी 
शबनमी ये रातें 
पर कभी कभी ये ख़ामोशी भी 
बड़ी बेगानी सी लगती है 
अनजाना है कोई वो 
जिसके बारे में गुफ्तगू करनी है 
इन रातों से... 
पर न जाने 
क्यों कुछ नहीं बोलती ये 
आखिर क्यों खामोश हैं ये रातें !!!


6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (16-07-2016) को "धरती पर हरियाली छाई" (चर्चा अंक-2405) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. ध्यान से सुनिये इनकी गुपचुप बातें

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  3. बहुत सुन्दर

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  4. कितनी रातें ... खामोश सी रातें पर एहसास में सब कुछ कह जाती रातें ...

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