Monday, April 28, 2014

अंब लौट जाने की बारी हमारी है....

बहुत रो लिए तुम्हारी बेवफाई पे 
बहुत लड़ लिए खुद से,
हज़ारों कदम बढ़ाये हमने 
तुम्हारी तरफ आने को। 
पर तुम मुर्दे बने 
वहीं खड़े रहे,
 न आई तुममें जान 
कि  बढ़  कर मेरा हाँथ थामते। 
खुद को  कोसा  मैंने 
कि  क्यों कर रही हूँ इतनी कोशिश, 
फिर समझा कुछ तो रिश्ता बचा था अभी। 
हाँ अब मैं भी तोड़ना चाहती हूँ,
इस रिश्ते को 
और अब लौट जाने की बारी हमारी है। 
न बढ़ाउंगी अब कोई कदम 
न ही होंगी अब तुम्हारी यादें 
बस अब पीछे हटने की बारी हमारी है।।


8 comments:

  1. रिश्तों को पीछे छोड़ना आसान नहीं....कदम लौटेंगे मगर मन वहीं छूट जाएगा...

    अनु

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  2. प्रेम में क्या आगे जाना या पीछे लौटना ... अगर वो नहीं कदम बढाता तो शायद उसे प्रेम ही नहीं था ... भाव पूर्ण अभिव्यक्ति ...

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  3. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (29-04-2014) को "संघर्ष अब भी जारी" (चर्चा मंच-1597) पर भी होगी!
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. प्रेम में ऐसा किसने कहाँ
    हमेशा मिलन ही है
    जुदाई कहाँ .....

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  6. बहुत मार्मिक वियोग । सच तो ये है कोई लौट नहीं पाता है । बहुत से लोग लौटना चाहते हैं पर लौट नहीं सके । एक बार चाहत बन जाने के बाद ह्रदय से उसे मरते दम तक नहीं भूल सकते । कोसिस करना धर्म है लेकिन जब हार जाए तब मेरा ये कमेन्ट याद आएगा ।

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