Friday, January 18, 2013

"गुजारिश "

आज तुमसे कुछ कहना और 
कुछ सुनना चाहती हूँ,
फिर से तुम्हें पलकों के 
साए में रखना चाहती हूँ।

सदियों से इंतज़ार था तुम्हारा,
अब आये हो तो पहलु में 
ठहरो भी ज़रा।
कुछ कहो और 
कुछ सुनो तो ज़रा,

हवाओं का अंदाज़ भी 
कुछ बदला - बदला सा है,
कुछ तुम्हारी ही तरह 
खफा - खफा सा है।

गर शिकायत है हमसे 
तो कहो तो सही,
बिना कहे तूफां लाना 
सही भी तो नहीं है।।



12 comments:

  1. बेहतरीन प्रस्तुति,,,,

    क्यों छेड़ते हो जिक्र न मिलने का रात का
    पूछेगें हम सबब तो बताया न जाएगा,,,,

    recent post : बस्तर-बाला,,,

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  2. बिना इज़हार के कहीं प्यार होता है ???

    अच्छी रचना..
    अनु

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  3. गुलाबी मनोभावों का सुंदर चित्रण

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  4. प्यार का आलम ही कुछ और होता है,बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति।

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  5. लाजवाब लिखती हैं आप।


    सादर
    ------
    खटरागी हूँ ....

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  6. आज तुमसे कुछ कहना और
    कुछ सुनना चाहती हूँ,
    फिर से तुम्हें पलकों के
    साए में रखना चाहती हूँ।
    बहुत ही खुबसूरत कविता |प्रतिभा जी आपका अंदाज निराला है |

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  7. गर शिकायत है हमसे
    तो कहो तो सही,
    बिना कहे तूफां लाना
    सही भी तो नहीं है।।

    ..बिलकुल सही कहा ..बिना वजह कुछ नहीं ...
    बहुत खूब।।

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  8. गर शिकायत है हमसे
    तो कहो तो सही,
    बिना कहे तूफां लाना
    सही भी तो नहीं है।।

    ..बिलकुल सही कहा ..बिना वजह कुछ नहीं ...
    बहुत खूब।।

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  9. Bahut sahi...
    Jo humaare zindagi ke bahut karib ho unko yah ehsaas hona chahiye ki hum,unhi se hai...

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