Passionate about poetry, nature and human psychology. A wanderer, firm believer of creativity, the best quality a person can acquire in his lifetime. This is the blog of Pratibha Verma.
Tuesday, December 17, 2019
Friday, October 18, 2019
Monday, September 30, 2019
Sunday, September 29, 2019
Friday, September 27, 2019
Monday, April 08, 2019
"आख़िर कब बदलेगी सोंच"
मेरी एक सहेली है
नाम है उसका छबीली
नैन नक्श बहुत ही कटीले हैं
उसी तरह के उसके विचार रुढिता से कहीं दूर
भाववादी लेकिन आज के हैं
क्योंकि वो आज की लड़की है
सोंच समझ में उसकी कोई कमी नहीं है
लेकिन आजाद ख्यालों की लड़की है वो
अच्छी खासी नौकरी है उसकी
अच्छा कमाती भी है
पर किसी के सामने झुकी नहीं
दो एक साल से रिश्ता नहीं हो रहा उसका
माँ बाप थोड़ा परेसान हैं
समाज के ताने और दुनियादारी से
मानो बचना चाहते हैं वो
अपनी ही बेटी से थोड़ा उखड़े रहते हैं
पर हाँ प्यार अभी भी उसे उतना ही करते हैं
पर जाने अनजाने उसका दिल
दुखा ही जाते हैं
पर छबीली को दीन दुनिया का
कोई खाश फ़र्क नहीं पड़ता
वो तो अपनी ही दुनिया में मस्त रहती है
पर हाँ अपने माँ बाप को
दुखी नहीं देखना चाहती
बहुत दिनों बाद आज वो
एक लड़के से मिलने को तैयार हो गई
फीके मन से ही सही
सब खुश थे घर में सुबह से
खैर शाम हो गई और पता भी नहीं चला
पूरा वक़्त तैयारियों में ही निकल गया
सबकुछ अच्छा चल रहा था
अचानक पता चला पापा ने रिश्ते को न कर दी
सबकुछ तो इतना अच्छा था
ये सुन कर छबीली मन ही मन मुस्कुराई
और वज़ह जानने के लिए सबके पास गई
पता चला पापा गुस्से से भन्नाए अभी भी बैठे हैं
छबीली को लगा इस बार तो
मैंने कोई गलती भी नहीं की
काफी सोंचने के बाद आखिर उससे रहा न गया
और पापा से पूछना ही वाजिब समझा
फिर पापा बिना साँस लिए बस बोलते ही गये
आये थे रिश्ता लेकर तो रिश्ते की बात करते
भले मानस भला ऐसे कौन बात करता है
उन्होंने कहा हमें दहेज वहेज तो चाहिए नहीं
फिर आपकी जो श्रद्धा
आप ही की बेटी है
आपको उसकी खुशी के लिए
जो भी सही लगे
हम दहेज़ के लोभी नहीं हैं
अरे हमारी जमा पूँजी हमारी बेटी है
दहेज मांगने का ये कैसा नया तरीका है
आखिर छबीली ने अपने पापा की
सोंच जाने अनजाने ही सही
बदल ही डाली।।
Saturday, February 02, 2019
शायद बस तुम्हे ही नहीं पता ...
शायद बस तुम्हे ही नहीं पता
पर ये खबर पूरे शहर में आम हो चुकी है।
हम तुम्हारे इश्क़ में
सरेआम हो चुके हैं।
बस अब इंतज़ार यही है
कि कब पलट के देखोगे मुझे
उस नज़र से !
सज़दे में तेरे हम
सुबह और शाम बैठें हैं।
तुम्हारा इंतज़ार कुछ इस कदर करते हैं
अपने कमरे की हर एक परछाईं को
हम तुमसे जोड़ बैठें हैं ।
हाँ जब तुम सामने आते हो
तो नज़र नहीं उठती
साँस थम सी जाती है
और हलक से आवाज़ नहीं निकलती।
जब तुम मेरे करीब से गुजरते हो
सब महक सा जाता है
और मेरे आस पास सिर्फ सन्नाटा हो जाता है।
बस अब इंतज़ार उस पल का है
जब तुम इन झुकी नज़रों का
मतलब समझ पाओगे।
उस दिन शायद हम
इश्क -ए - इज़हार कर पाएंगे।।
पर ये खबर पूरे शहर में आम हो चुकी है।
हम तुम्हारे इश्क़ में
सरेआम हो चुके हैं।
बस अब इंतज़ार यही है
कि कब पलट के देखोगे मुझे
उस नज़र से !
सज़दे में तेरे हम
सुबह और शाम बैठें हैं।
तुम्हारा इंतज़ार कुछ इस कदर करते हैं
अपने कमरे की हर एक परछाईं को
हम तुमसे जोड़ बैठें हैं ।
हाँ जब तुम सामने आते हो
तो नज़र नहीं उठती
साँस थम सी जाती है
और हलक से आवाज़ नहीं निकलती।
जब तुम मेरे करीब से गुजरते हो
सब महक सा जाता है
और मेरे आस पास सिर्फ सन्नाटा हो जाता है।
बस अब इंतज़ार उस पल का है
जब तुम इन झुकी नज़रों का
मतलब समझ पाओगे।
उस दिन शायद हम
इश्क -ए - इज़हार कर पाएंगे।।
Thursday, December 13, 2018
मुझे वो लम्हा भुलाना नहीं ...
भुला तो सकती हूँ तुम्हें
पर भुलाना नहीं चाहती
तुम्हारे साथ बिताए उस लम्हे को
कोई नाम या पहचान नहीं देना चाहती
वो जो पल हमने संग बिताया था
एक खूबसूरत सा लम्हा बन के रह जाएगा
तुम्हारी भीनी सी वो खुसबू
दिल और दिमाग के किसी कोने में बसा ली है
हाँ बातें तो बहुत करनी थी पर शायद
सही वक़्त ही नहीं आया
चलो कोई नहीं ...
वक़्त नहीं मिलने का
कोई अफ़सोस नहीं है मुझे
न ही तुमसे जुड़े रहने की कोई चाहत
बस तुम्हे भुलाना नहीं चाहती !!
वो मद्धिम सी रोशनी में
मेरा हाँथ थाम के मुझे गले से लगाना
और एक ही पल में
मेरे अंदर एक तूफ़ां का आना
अंदर से पूरी हिल गई थी
मानो सारे तार एक साथ बज उठे थे
फिर कुछ ही पल में खुद को खुद में समेटकर
कुछ वक़्त खुद की धड़कनो को भुला कर
तुम्हारी धड़कनो को सुनने में मेरा वो मशगूल हो जाना
फिर तुम्हारी पनाहों में यूँ खो जाना
हाँ सब याद है मुझे !!
नहीं मुझे तुम्हे कुछ याद नहीं दिलाना
न ही किसी और मुलाकात का अब बहाना बनाना
माना एक अरसा बीत चुका है हमें मिले हुए
पर तुम्हारा वो मेरा हाँथ थामकर
अपनी तरफ खींचकर अपनी बाँहों में लेना
फिर मेरे मत्थे पे एक प्यारा सा एहसास देना
मुझे आज भी कल का किस्सा लगता है!!
चलो छोड़ो जाने भी दो
सच कहूं ...
न ही कोई शिकवा है तुमसे न ही कोई शिकायत
बस उस लम्हे को कहीं एक मीठी याद की तरह
सँजो लेना चाहती हूँ
और उस मुलाकात को कभी भुलाना नहीं चाहती !!
उस दिन वापस लौट आने की ज़िद मेरी न थी
पर कम्बख़्त ये दिमाग नहीं माना
खींच के तुम्हारे पहलु से
कोई दूर सुनसान सी सड़क पे
ले जाके छोड़ दिया
पूरे रास्ते सोंचती रही काश तुम
हाँथ थाम लेते और कहते मत जाओ
हाँ शायद मैं भी रुक जाती उस रोज
पर क्या फायदा...
वापस आना भी तो जरूरी था
खुद को समेट कर किसी तरह
चली आयी मैं वहाँ से
पर दिल के किसी टुकड़े को छोड़ आई
उस मद्धिम सी रोशनी में !!
चलो ये भी बता दूँ मैं उसे वापस लेना नहीं चाहती
रहने दो उसे वहीँ उसी जगह पे
हाँ मेरा मकसद तुम्हे वो सब याद दिलाना नहीं
पर सच कहूं मुझे वो लम्हा भुलाना नहीं
मुझे वो लम्हा भुलाना नहीं !!
पर भुलाना नहीं चाहती
तुम्हारे साथ बिताए उस लम्हे को
कोई नाम या पहचान नहीं देना चाहती
वो जो पल हमने संग बिताया था
एक खूबसूरत सा लम्हा बन के रह जाएगा
तुम्हारी भीनी सी वो खुसबू
दिल और दिमाग के किसी कोने में बसा ली है
हाँ बातें तो बहुत करनी थी पर शायद
सही वक़्त ही नहीं आया
चलो कोई नहीं ...
वक़्त नहीं मिलने का
कोई अफ़सोस नहीं है मुझे
न ही तुमसे जुड़े रहने की कोई चाहत
बस तुम्हे भुलाना नहीं चाहती !!
वो मद्धिम सी रोशनी में
मेरा हाँथ थाम के मुझे गले से लगाना
और एक ही पल में
मेरे अंदर एक तूफ़ां का आना
अंदर से पूरी हिल गई थी
मानो सारे तार एक साथ बज उठे थे
फिर कुछ ही पल में खुद को खुद में समेटकर
कुछ वक़्त खुद की धड़कनो को भुला कर
तुम्हारी धड़कनो को सुनने में मेरा वो मशगूल हो जाना
फिर तुम्हारी पनाहों में यूँ खो जाना
हाँ सब याद है मुझे !!
नहीं मुझे तुम्हे कुछ याद नहीं दिलाना
न ही किसी और मुलाकात का अब बहाना बनाना
माना एक अरसा बीत चुका है हमें मिले हुए
पर तुम्हारा वो मेरा हाँथ थामकर
अपनी तरफ खींचकर अपनी बाँहों में लेना
फिर मेरे मत्थे पे एक प्यारा सा एहसास देना
मुझे आज भी कल का किस्सा लगता है!!
चलो छोड़ो जाने भी दो
सच कहूं ...
न ही कोई शिकवा है तुमसे न ही कोई शिकायत
बस उस लम्हे को कहीं एक मीठी याद की तरह
सँजो लेना चाहती हूँ
और उस मुलाकात को कभी भुलाना नहीं चाहती !!
उस दिन वापस लौट आने की ज़िद मेरी न थी
पर कम्बख़्त ये दिमाग नहीं माना
खींच के तुम्हारे पहलु से
कोई दूर सुनसान सी सड़क पे
ले जाके छोड़ दिया
पूरे रास्ते सोंचती रही काश तुम
हाँथ थाम लेते और कहते मत जाओ
हाँ शायद मैं भी रुक जाती उस रोज
पर क्या फायदा...
वापस आना भी तो जरूरी था
खुद को समेट कर किसी तरह
चली आयी मैं वहाँ से
पर दिल के किसी टुकड़े को छोड़ आई
उस मद्धिम सी रोशनी में !!
चलो ये भी बता दूँ मैं उसे वापस लेना नहीं चाहती
रहने दो उसे वहीँ उसी जगह पे
हाँ मेरा मकसद तुम्हे वो सब याद दिलाना नहीं
पर सच कहूं मुझे वो लम्हा भुलाना नहीं
मुझे वो लम्हा भुलाना नहीं !!
Wednesday, December 05, 2018
ऐ ज़िन्दगी तुझे...
ऐ ज़िन्दगी तुझे मैं क़रीने से बयां करुँगी
हर एक किस्से को सलीके से लिखूंगी
इन राहों पे चलते चलते
कभी थकान नहीं लगती
फिर तूने लाख कोशिश क्यों न कर ली हो
मेरे हर सफर को मुश्किल बनाने की
पर मैंने कभी हार नहीं मानी
न ही कभी थमी बस चलती गई
तबियत से बयाँ करुँगी हर वो किस्सा
हर लफ्ज़ को बड़े ही किफ़ायत से लिखूंगी
ऐ ज़िन्दगी तुझे...
मौके बहुत आये
जब तूने मेरे हर मोड़ पे तूफ़ां लाये
तूने हर कोशिश कर ली
मुझे हराने की, लाचार बनाने की
पर मैं भी हिम्मत की पक्की निकली
देख तेरे सामने डट के खड़ी हूँ आज
ऐ ज़िन्दगी तुझे...
तेरी ख़ुशी का अन्दाज़ा भी लगा सकती हूँ
तू आज हंस रही है अपनी ही हार पे
फ़क्र है तुझे मेरी हिम्मत पे
गुरुर है तुझे मेरे हर जज़्बे पे
हाँ तूने मुझे जीना सिखा दिया
हर जंग में जीतना सिखा दिया !
ऐ ज़िन्दगी तुझे मैं क़रीने से बयां करुँगी !!
Thursday, November 22, 2018
जब हम न होंगे
जब हम न होंगे
हमारी बातें भी न होंगी !
तुम चाहोगे भी
तो ये मुलाकातें न होंगी !
यादों से भी तुम्हारी
हम इस कदर चले जाएंगे
कि ख़यालों में भी बातें न होंगी !
तुम्हारी सोंच से भी हम
दूर चले जाएंगे ,
तुम्हें हमारा नाम याद करने में
फिर तकलीफें न होंगी !!
हमारी बातें भी न होंगी !
तुम चाहोगे भी
तो ये मुलाकातें न होंगी !
यादों से भी तुम्हारी
हम इस कदर चले जाएंगे
कि ख़यालों में भी बातें न होंगी !
तुम्हारी सोंच से भी हम
दूर चले जाएंगे ,
तुम्हें हमारा नाम याद करने में
फिर तकलीफें न होंगी !!
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